एस्ट्रोसेज का पहला रीटेल आउटलेट शुरू

अब ऑफ लाइन खरीदारी का भी उठाएँ लाभ! नोएडा में दुनिया की #1 ज्योतिष वेबसाइट एस्ट्रोसेज डॉटकॉम के रीटेल स्टोर “गैलेक्सी एस्ट्रोसेज” का शुभारंभ। ऑनलाइन माध्यम के साथ-साथ अब एस्ट्रोसेज की ज्योतिषीय सेवाएँ और उत्पाद रीटेल सेक्टर में भी उपलब्ध होंगे।


दुनिया की # 1 ज्योतिष वेबसाइट एस्ट्रोसेज ने रीटेल सेक्टर में अपना पहला कदम रखा है। अपने नए रीटेल आउटलेट “गैलेक्सी एस्ट्रोसेज” के साथ कंपनी अब खुदरा बाज़ार में उतर चुकी है। इसके साथ ही ऑनलाइन माध्यम के साथ-साथ एस्ट्रोसेज की ज्योतिषीय सेवाएँ और उत्पाद अब रीटेल सेक्टर में भी उपलब्ध होंगे। लोगों की ज्योतिषीय और धार्मिक ज़रूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस नए आउटलेट का उद्घाटन 27 अक्टूबर 2018 को केंद्रीय संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने नोएडा में किया है।

“गैलेक्सी एस्ट्रोसेज” में क्या पाएंगे आप ?


गैलेक्सी एस्ट्रोसेज आउटलेट में ज्योतिषीय परामर्श, पूजा-पाठ आदि से लेकर रत्न-रुद्राक्ष, यंत्र, माला, फ़ेंगशुई और वास्तु आदि सभी से जुड़ी सुविधाएँ और उत्पाद मुहैया कराए जाएंगे। यहाँ ज्योतिष, धर्म और अध्यात्म से संबंधित सामग्री व परामर्श सभी-कुछ प्राप्त किया जा सकेगा। इसके अलावा वे सभी सेवाएं जो अब तक आप ऑनलाइन माध्यम से प्राप्त करते आए हैं, वे सभी सेवाएं और उत्पाद अब आपको गैलेक्सी एस्ट्रोसेज पर मिल सकेगी।

“गैलेक्सी एस्ट्रोसेज” देश के रीटेल सेक्टर पर नज़र

रीटेल सेक्टर में उतरने के इस क़दम के पीछे की सोच को समझाते हुए एस्ट्रोसेज के संस्थापक पुनीत पाण्डे ने बताया, “हम देश भर में 2019 के अन्त तक इस तरह के 50 आउटलेट खोलने जा रहे हैं। यह 30 बिलियन डॉलर का बाज़ार है और अभी भी पूरी तरह असंगठित है। चूँकि इस बाज़ार में हमारी उपस्थिति सबसे बड़ी है, इसलिए हमारे लिए लाज़मी है कि हम इसी दिशा में आगे बढ़ें और मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाएँ।”

केंद्रीय संस्कृति मंत्री डॉ. महेश शर्मा ने एस्ट्रोसेज गैलेक्सी आउटलेट का उद्घाटन किया और एस्ट्रोसेज की पूरी टीम शुभकामनाएं दी। 

एस्ट्रोसेज के रीटेल प्रमुख डीडी तिवारी इस बारे में और रोशनी डालते हुए बताते हैं, “हम पहले से ही ज्योतिष की सबसे बड़ी वेबसाइट हैं। साथ ही हमने हाल में मोबाइल पर 15 मिलियन ऑर्गेनिक डाउनलोड्स का पड़ाव पार किया है। लेकिन भारत बहुत बड़ा देश है और यहाँ ऐसे बहुत-से लोग हैं जिन्हें सिर्फ़ ऑनलाइन रहकर नहीं छुआ जा सकता है। एस्ट्रोसेज की यह रीटेल चेन उन लोगों की पहुँच में होगी जो अपनी मेहनत की कमाई ख़र्च करने से पहले चीज़ को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं। भारत में इस समय जो स्टार्टअप ईकोसिस्टम है, उसके मद्देनज़र ’एस्ट्रोसेज गैलेक्सी’ निश्चित ही विकास का इंजन साबित होगा।”

“गैलेक्सी एस्ट्रोसेज” के माध्यम से हम देश-विदेश के सभी पाठकों को बेहतर उत्पाद और ज्योतिषीय सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। 

हम आशा करते हैं कि एस्ट्रोसेज का यह प्रयास सभी पाठकों के लिए लाभकारी होगा। आपसे मिलने वाले स्नेह और विश्वास के लिए धन्यवाद!
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क्या होती है शनि साढ़े साती?

पढ़ें और समझें इसका ज्योतिषीय महत्व! पढ़ें शनि साढ़े साती और ढैय्या किसे कहते हैं। इसका मानव जीवन पर क्या प्रभाव होता है, साथ ही जानें इससे संबंधित उपाय।


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शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का नाम सुनते ही लोग भयभीत होने लगते हैं। वैदिक ज्योतिष में शनि को क्रूर ग्रह कहने की वजह से शायद लोगों में यह धारणा है कि शनि एक कष्टकारी ग्रह है लेकिन ऐसा नहीं है। समस्त ग्रहों में शनि देव को दण्डनायक का पद प्राप्त है, इसलिए उन्हें कलियुग का न्यायाधीश कहा गया है। वे संसार के प्रत्येक व्यक्ति को उसके द्वारा किये गये शुभ और अशुभ कर्मों का फल देने का कार्य करते हैं। शनि की दृष्टि में पद, स्थिति और प्रतिष्ठा कोई बात मायने नहीं रखती है। वे समान रूप से हर व्यक्ति को दंडित और उसके साथ न्याय करते हैं। 

अपने अपराधों की क्षमा याचना और शुभ कर्मों का संकल्प करने वाले व्यक्ति पर शनि देव प्रसन्न होते हैं। वहीं मनुष्य के पापों का दण्ड देने में शनि अत्यंत क्रूर ग्रह है। क्योंकि शनि जब सजा देते हैं तो धन, मान, प्रतिष्ठा और समस्त सुख-सुविधाओं से वंचित कर देते हैं। 

क्या आप भी शनि की साढ़ेसाती से पीड़ित है? पाएँ निःशुल्क शनि साढ़ेसाती रिपोर्ट

शनि की साढ़े साती क्या होती है?


जब कुंडली में जन्म राशि अर्थात चंद्र राशि से बारहवें स्थान पर शनि का गोचर प्रारंभ होता है तो इसी समय से जीवन में साढ़ेसाती का आरंभ होता है। जब शनि का गोचर जन्म राशि अर्थात जन्म-कालीन चंद्रमा पर होता है तो यह साढ़ेसाती का मध्य भाग माना जाता है और जब शनि जन्म राशि से द्वितीय भाव में प्रवेश करता है तब से साढ़ेसाती का अंतिम भाग प्रारंभ माना जाता है। क्योंकि शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक स्थित रहता है इसलिए 3 भावों को कुल मिलाकर 7.5 वर्षों के समय अंतराल में पूर्ण करता है इसी कारण शनि के इस विशेष गोचर को साढ़ेसाती कहा जाता है। साढ़ेसाती के अलावा शनि जब जन्म राशि यानि जन्म कुंडली में स्थित चंद्रमा से चतुर्थ भाव, अष्टम भाव में भ्रमण करता है तो उसे छोटी साढ़ेसाती या ढैय्या कहते हैं। इसकी अवधि ढाई साल की होती है। साढ़ेसाती के अलावा शनि जब जन्म राशि यानि जन्म कुंडली में स्थित चंद्रमा से चतुर्थ भाव, अष्टम भाव में भ्रमण करता है तो उसे छोटी साढ़ेसाती या ढैय्या कहते हैं। इसकी अवधि ढाई साल की होती है।



शनि साढ़े साती के सरल उपाय


शनि की साढ़े साती के अशुभ प्रभाव से बचने का सबसे सरल उपाय है शुभ कर्म करना और अपने समस्त बुरे कर्मों का पश्चताप करना। इसके अतिरिक्त धार्मिक और वैदिक उपायों के जरिये भी शनि की साढ़े साती से बचा जा सकता है।

  • शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार को शनिदेव का पूजन करें, साथ ही सरसों के तेल से निर्मित कोई भोज्य पदार्थ, गरीब, मजदूर और कुत्ते को अवश्य दें।
  • शनि देव के पूजन में सरसों का तेल, काला नमक, सुरमा, कपूर से निर्मित काजल, काले तिल, काली उड़द, लोहे की कील, इत्र आदि का उपयोग करें और साथ ही इनका दान करें।
  • शनि देव की कृपा पाने के लिए प्रत्येक शनिवार को शनि चालीसा, हनुमान चालीसा या दशरथकृत शनि स्त्रोत का पाठ करना लाभदायक होता है।
  • एक लोहे के पात्र में सरसों का तेल डालकर उसमें अपना चेहरा देखकर दान करना चाहिए, इसे ही छाया पात्र दान कहा जाता है।
  • मामा एवं बुजुर्ग लोगों का सम्मान करें। कर्मचारिओं अथवा नौकरों को हमेशा ख़ुश रखें।
  • शनि दोष निवारण के लिए शनि बीज मंत्र का जाप करें। मंत्र - “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”
  • शनि ग्रह को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का भी जाप कर सकते हैं- “ॐ शं शनिश्चरायै नमः”
वैदिक ज्योतिष में शनि को क्रूर ग्रह कहा गया है लेकिन शनि शत्रु नहीं मित्र हैं। वे हर मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार दंडित करते हैं, इसलिए अगर शनि से बचना है तो शुभ और सतकर्म करते रहें।


हम आशा करते हैं कि शनि साढ़े साती पर आधारित यह लेख आपको पसंद आया होगा। एस्ट्रोसेज की ओर से उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ!

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हस्तरेखा से जानें कैसी रहेगी आपकी सेहत

हस्तरेखा में छुपा है आपकी सेहत का राज़! जानें हथेली की रेखाओं से कैसा रहेगा आपका स्वास्थ्य।


हस्त रेखा शास्त्र भारतीय संस्कृति की देन है। जिसका जन्म सामुद्रिक शास्त्र से हुआ है। सामुद्रिक शास्त्र के अंतर्गत मानव शरीर का अध्ययन किया जाता है और उसी के एक भाग के रूप में हस्तरेखा शास्त्र से हाथों, उन पर बनने वाले विशेष चिन्हों, रेखाओं तथा उंगलियों का अध्ययन करके व्यक्ति के भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य काल के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।


यह राशिफल चंद्र राशि पर आधारित है। चंद्र राशि कैल्कुलेटर से जानें अपनी चंद्र राशि

हस्त रेखा के अंतर्गत हाथ के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न ग्रहों का वास माना जाता है और उन पर उपस्थित विभिन्न चिन्हों के माध्यम से अच्छे और बुरे समय का अध्ययन किया जाता है। एक हथेली में मुख्य रूप से जीवन रेखा, हृदय रेखा, मस्तिष्क रेखा, भाग्य रेखा, विवाह रेखा आदि पाई जाती हैं। इसी के साथ-साथ स्वास्थ्य रेखा भी देखी जाती है। यह रेखा सभी लोगों के हाथों में नहीं पाई जाती, लेकिन किसी विशेष रेखा का ना होना किसी प्रकार की विसंगति नहीं है अर्थात यदि हाथ में यह रेखा नहीं है तो भी कोई चिंता की बात नहीं है।


स्वास्थ्य रेखा


स्वास्थ्य रेखा के माध्यम से किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है और उसको होने वाले रोगों को ज्ञात किया जा सकता है। लेकिन जिन हाथों में यह रेखा नहीं पाई जाती उन हाथों में भी अन्य रेखाओं तथा ग्रहों से संबंधित प्रतीक चिन्हों को देखकर रोगों के संबंध में जाना जा सकता है।

हथेली के आधार अर्थात चंद्र पर्वत से कनिष्ठिका उंगली अर्थात बुध पर्वत तक पहुंचने वाली रेखा को स्वास्थ्य रेखा कहते हैं, इसे बुध रेखा भी कहा जाता है। इस रेखा के माध्यम से विशेष रुप से व्यक्ति के स्वास्थ्य, उसकी शक्ति, अमाशय तथा यकृत आदि के बारे में जाना जाता है। इस रेखा का उद्गम हथेली के आधार पर किसी भी स्थान से हो सकता है और उसी के आधार पर स्वास्थ्य के बारे में जाना जाता है। यदि यह रेखा जीवन रेखा अथवा भाग्य रेखा से दूर हो तो ज्यादा शुभता प्रदान करती है।


स्वास्थ्य रेखा देखकर जानें अपनी सेहत 


एक गहरी और स्पष्ट स्वास्थ्य रेखा आपके अच्छे पाचन तंत्र को बताती है। ऐसे व्यक्ति अंदर से बहुत मजबूत होते हैं और उनके रोगों से लड़ने की क्षमता अच्छी होती है। ऐसे व्यक्तियों की स्मृति तेज होती है और वे मानसिक रुप से काफी मजबूत होते हैं।

यदि स्वास्थ्य रेखा आड़ी-तिरछी रेखाओं द्वारा कट रही हो तो आयु के अनुसार स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां उत्पन्न करती हैं। यदि यह रेखा जंजीर नुमा है तो जीवन भर पेट से संबंधित बीमारियों का कारण बनती है। विशेष रूप से यदि बुध रेखा पर द्वीप हों तो अधिक गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। ऐसे में आंतों की बीमारी होना संभव है।

यदि बुध रेखा लहरदार है तो ऐसे व्यक्तियों को यकृत अथवा पित्त संबंधित रोग होने की संभावना अधिक होती है। साथ ही मलेरिया अथवा ज्वर या पीलिया जैसे रोग व्यक्ति को परेशान कर सकते हैं। यदि इस रेखा पर पीलापन अधिक दिखाई दे तो पीलिया अथवा गुप्त रोग की संभावना हो सकती है।

यदि किसी व्यक्ति की स्वास्थ्य रेखा सुस्पष्ट हो लेकिन जीवन रेखा पतली हो या कहीं से कटी-फटी हो तो ऐसी स्थिति स्वास्थ्य में सुधार को इंगित करती है। इसी प्रकार यदि मस्तिष्क रेखा कमजोर हो और स्वास्थ्य रेखा अच्छी हो तो स्वास्थ्य रेखा मस्तिष्क संबंधित बीमारियों में भी शुभ फल प्रदान करती है। इसके विपरीत होने पर स्वास्थ्य अधिक खराब रहने की संभावना होती है। विशेष रूप से मस्तिष्क तथा पेट संबंधी समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है।

इसी प्रकार ह्रदय रेखा यदि शुभ स्पष्ट है लेकिन स्वास्थ्य रेखा टूटी-फूटी है तो ह्रदय और जिगर संबंधित समस्याएँ व्यक्ति को परेशान कर सकती हैं। इसके विपरीत होने पर ऐसी समस्याओं में सुधार प्राप्त होता है।


हस्तरेखा शास्त्र में विभिन्न ग्रहों का संबंध हथेली में दिखाया गया है। उनके माध्यम से भी जीवन में होने वाले रोगों के बारे में जाना जा सकता है। आइये जानते हैं किन-किन कारणों से कौन-कौन से रोग हो सकते हैं:
  • यदि स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो तो व्यक्ति को मंदाग्नि की पीड़ा रहती है।
  • यदि बुध रेखा पर त्रिभुज का चिन्ह हो तो यह उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक होता है।
  • यदि मंगल ग्रह के पर्वत पर अधिक रेखाएं हैं तो पेट संबंधित अथवा रक्त संबंधित रोग होने की आशंका रहती है।
  • यदि मंगल पर्वत से निकली हुई रेखाएं जीवन रेखा को काटती हुई शनि पर्वत तक जाए तो व्यक्ति को चोट अथवा एक्सीडेंट का भय रहता है।
  • यदि मंगल पर्वत से निकली रेखा मस्तिष्क रेखा और जीवन रेखा को पार करके शनि पर्वत तक जाए तो गंभीर रोग उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • यदि उर्ध्व मंगल पर्वत पर तिल का चिन्ह हो तो नेत्रों में पीड़ा होने की संभावना बढ़ जाती है। 
  • मस्तिष्क रेखा चंद्र पर जाए और अन्य रेखाओं की तुलना में अधिक पतली हो तो उच्च रक्तचाप अथवा पेट संबंधित समस्या होने की संभावना रहती है।
  • यदि शनि पर्वत पर कटी-फटी रेखाएं उपस्थित हों तो दांतों से संबंधित रोग जैसे पायरिया अथवा गैस वृद्धि की समस्या हो सकती है।
  • शनि पर्वत पर जंजीर नुमा रेखाएं हों और मंगल पर्वत पर भी अधिक रेखाएं हो तो व्यक्ति को गठिया जैसी समस्या घेर सकती है।
  • मंगल पर्वत पर क्रॉस होना बवासीर का कारण बन सकता है। यदि शनि पर्वत पर भी क्रॉस का चिह्न हो तो यह समस्या और बड़ी हो सकती है।
  • यदि जीवन रेखा और मस्तिष्क रेखा आपस में मिलती हो और गुरु पर्वत अविकसित हो तो गले से संबंधित रोग हो सकते हैं।
  • यदि हथेली की स्वास्थ्य रेखा पर नक्षत्र का चिन्ह बना है तो ऐसा जातक संतान प्राप्ति में बाधा उठाता है।
  • यदि मस्तिष्क रेखा और स्वास्थ्य रेखा पूर्ण रुप से स्पष्ट हो तो व्यक्ति तीव्र स्मरण शक्ति का स्वामी होता है।
  • यदि स्वास्थ्य रेखा से कई शाखाएं ऊपर की ओर निकल कर जाएं तो ऐसे व्यक्ति उत्तम स्वास्थ्य का आनंद लेता है।


  • इसके विपरीत यदि शाखाएं नीचे की ओर जाए तो स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां लगी रहती हैं।
  • यदि किसी महिला की जीवन रेखा टूटी-फूटी हो तो उसको मासिक धर्म तथा गर्भाशय संबंधित रोग होने की संभावना अधिक होती है।
  • शनि पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह किसी लड़ाई में दुर्घटना, मानसिक रोग तथा बांझपन जैसी समस्याएं दे सकता है। यदि जाल बना हुआ हो तो व्यक्ति में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ाती है तथा यदि वृत्त बना हुआ है तो किसी ज़हर से कष्ट अथवा सांप के काटने की संभावना बढ़ जाती है।
  • सूर्य पर्वत पर जाल का निशान मानसिक विकास तथा मानहानि देता है।
  • बुध पर्वत पर तारे का चिन्ह अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक होता है। वहीं दूसरी ओर क्रॉस का चिन्ह त्वचा रोग, जाल तथा तिल का होना भी त्वचा रोग दे सकता है। बुध पर्वत पर द्वीप होना बुरे स्वास्थ्य का द्योतक है लेकिन यदि वृत्त बना है तो यह दीर्घायु देने में सक्षम होता है।
  • चंद्र पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह अज्ञात भय, जल से भय, मूत्र संबंधित रोग के संकेत देता है।
  • चंद्र पर्वत पर जाल मिर्गी रोग, आत्महत्या की प्रवृत्ति, भय और निराशावादी सोच देता है।
  • चंद्र पर्वत पर वृत्त का चिन्ह कफ़ से संबंधित बीमारियां तथा द्वीप का चिन्ह मनोरोग, नींद में चलना, डिप्रेशन आदि परेशानियों को जन्म देता है।
  • मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह शारीरिक चोट, जाल का चिन्ह मानसिक अशांति, आत्महत्या की प्रवृत्ति तथा तिल का चिन्ह रक्तचाप संबंधित अनियमितता, अंग-भंग, झगड़े में चोट लगना जैसी परेशानियों की ओर इशारा करता है।
  • शुक्र पर्वत पर क्रॉस का चिन्ह गुप्त रोग, जाल का चिन्ह स्वास्थ्य हानि, तिल का चिन्ह सुजाक, गुप्त रोग, जल से भय, वृत्त का चिन्ह दुर्घटना में अंग-भंग, शुक्र संबंधी रोग तथा दीर्घ कालिक रोगों को जन्म देता है।
  • राहु पर क्रॉस का चिन्ह दीर्घ कालिक बीमारी, जाल का चिन्ह उन्माद, मस्तिष्क रोग, मतिभ्रम, तिल का चिह्न रक्त-विकार जैसी समस्याएं देता है।
  • केतु पर क्रॉस का चिन्ह बचपन में बीमारियां, जाल का चिन्ह अनेक प्रकार की बीमारियां, तिल का चिन्ह चेचक जैसे रोग तथा द्वीप का चिन्ह शारीरिक कमजोरी तथा बीमारियों का द्योतक है।
  • अत्यधिक विकसित गुरु पर्वत से मोटापे की समस्या उत्पन्न हो सकती है। अपच और मधुमेह जैसी बीमारियां भी गुरु पर्वत की अशुभता के कारण होती हैं। इसके अतिरिक्त गुरु पर्वत के द्वारा शरीर पर आने वाली सूजन का भी आंकलन किया जाता है।
  • यदि आपके हाथों के नाखून साफ सुथरे और स्पष्ट हैं तो यह अच्छे स्वास्थ्य की ओर इंगित करते हैं।
  • यदि शनि पर्वत अविकसित हो और गुरु पर्वत भी उन्नत ना हो तो व्यक्ति को गठिया तथा जोड़ों के दर्द की समस्या या फिर गैस से संबंधित समस्या उत्पन्न हो सकती है।


इस प्रकार हस्तरेखा शास्त्र के माध्यम से हम विभिन्न प्रकार के रोगों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और उन कारणों को जानकर संबंधित उपाय करके उन रोगों से बचाव कर सकते हैं। आशा करते हैं कि हस्तरेखा विज्ञान से जुड़ा यह आलेख आपके लिए कारगर साबित होगा।
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भारत बनाम ऑस्ट्रेलिया - सितारों के मुताबिक़ कौन बनेगा विजेता?

आज है भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच रोमांचक सेमीफाइनल का मुकाबला। सभी की निगाहें इस मैच पर हैं। क्योंकि जो टीम आज जीतेगी वो सीधे ‘वर्ल्ड कप 2015’ के फाइनल में पहुँचेगी। “आचार्य रमन” आपको बताएँगे की कौन सी टीम होगी फाइनल में और कौन सी टीम जाएगी घर।

विश्व कप का रोमांच इस समय अपने चरम पर है। और आखिरी सेमीफ़ाइनल बस आने ही वाला है, जिसमे भारत और ऑस्ट्रेलिया एक दूसरे के विरुद्ध खेलेंगे। केपी पद्धति के हिसाब से आज भी हमेशा की तरह में आपको विजेता के बारे में बताने का प्रयत्न करूँगा। नतीज़ा जो हो वह सिर्फ भगवान जानता है। हम ज्योतिषी सिर्फ एक प्रयास करते हैं, यह जानने का की भविष्य में क्या हो सकता है। वह सच हो भी सकता है और नहीं भी।

तारीख़: 24:03:2015
समय: 10:34:05
स्थान: नई दिल्ली
केपी होरारी नंबर: 233


मैने इसमें भारत के पक्ष में पूछा है। चलिए अब डेटा का विश्लेषण करके देखें।

लग्न का उपनक्षत्र स्वामी- बुध ग्रह है जो बृहस्पति के नक्षत्र में है और उप नक्षत्र में शनि ग्रह है। दोनों ही ग्रह वक्री स्थिति में हैं।

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  • छठे घर का उपनक्षत्र स्वामी- शनि खुद के नक्षत्र में और सूर्य के उपनक्षत्र में है।
  • ग्यारहवें घर का उपनक्षत्र स्वामी- राहु चन्द्र के नक्षत्र में और शनि के उपनक्षत्र में है।

अगर हम ग्रहों की चाल देखें, तो केपी के ज्योतिषों के अनुसार यह टीम हारेगी, लेकिन उस से पहले विरोधी टीम की स्थिति भी देख लेते हैं।
लग्न का उपनक्षत्र स्वामी- बुध ग्रह फिर से बृहस्पति के नक्षत्र में है। और उप नक्षत्र में शनि ग्रह है। दोनों ही ग्रह वक्री स्थिति में है।

  • छठे घर का उपनक्षत्र स्वामी- शनि खुद के नक्षत्र में और सूर्य के उपनक्षत्र में है।
  • ग्यारहवें घर का उपनक्षत्र स्वामी- राहु चन्द्र के नक्षत्र में और शनि के उपनक्षत्र में है।

चन्द्र सूर्य के नक्षत्र में और बुध के उपनक्षत्र में है।

आइए देखते हैं की ये ग्रह किस भाव को निर्देशित करते हैं:

ग्रहों द्वारा निर्देशित भाव


भाव             ग्रह



सूर्य          1  8  12
चंद्रमा        1  2  6
मंगल         1  2  9
बुध          1  4  5  7  10 11 12
बृहस्पति       4  5  7  10 11 12
शुक्र         2  3  8
शनि         8  12
राहु          2  6  7
केतु         1  8  12

एक ग्रह निम्न स्तर से विभिन भावों के प्रति सापेक्षिक रुझान प्रदर्शित करता है-

पहले स्तर- ग्रह के नक्षत्र स्वामी जिस भाव में है - वह भाव।
दूसरे स्तर- ग्रह स्वयं जिस भाव में है वह भाव।
तीसरे स्तर- ग्रह का नक्षत्र स्वामी के स्वामित्व वाले भाव।
चौथे स्तर- ग्रह के स्वयं के स्वामित्व वाले भाव।

ग्रहों की शक्ति के घटते या बढ़ते क्रम की कारकत्व में पहले भाग में कारकत्व दूसरे भाग के कारकत्व से ज्यादा शक्तिशाली है। दूसरे भाग का कारकत्व, तीसरे भाग के कारकत्व से ज्यादा शक्तिशाली है। और इसी प्रकार तीसरे भाग का कारकत्व चौथे भाग से ज्यादा शक्तिशाली हैं।

भारत के लिए भावों की दर्शाता है -

(1) 5,12,1,10,11,4,7
(2) 8,12
(3) 2,6,7

ऑस्ट्रेलिया के लिए भावों की दर्शाता है -

(1) 11,6,7,4,5,10,1
(2) 2,6
(3) 8,12,7

जैसे की हमारे सम्मानित पाठकों ने पढ़ा है, यह मैच किसी भी टीम का मैच हो सकता है। उप-उप नक्षत्र में भी यह ही लग रहा है की इस मैच का परिणाम किसी भी टीम के पक्ष में हो सकता है। मुझे ऐसा लगता है कि अंततः इस मैच का परिणाम भारत के पक्ष में जाएगा और हम इस मैच को ज़रुर जीतेंगे। दोनों टीमों को हार्दिक शुभकामनाएँ।

आचार्य रमन
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नव संवत में शनि का प्रकोप, जानिए कैसा होगा आप पर असर

विक्रम संवत्सर 2072 की शुरुआत हो चुकी है। क्या आप जानते हैं की शनि देव करेंगे इस साल सभी राशियों पर राज? क्या बच पाएँगे आप नव वर्ष में शनि देव के कहर से? घबराइए मत। हम बताएँगे आपको की शनि की दृष्टि का आप पर कैसा होगा असर, लेकिन आइए पहले जान लें क्या है विक्रम संवत्सर 2072। 


विक्रम संवत्सर 2072, 21 मार्च 2015 को प्रारंभ हो रहा है। विक्रम संवत अत्यंत प्राचीन संवत है। विक्रम संवत का प्रेरणास्त्रोत सम्राट विक्रमादित्य को माना जाता है। इस वर्ष संवत्सर 2072 का नाम कीलक है। इस बार मंत्रिमंडल में राजा का पद “शनि“ को तथा मंत्री का पद “मंगल” को प्राप्त होगा। शनि देवता को न्याय का देवता माना जाता है जिससे भ्रष्टाचार और अपराध के मामलों में सख्ती होगी। मंगल के मंत्री होने से जिन स्थानों पर कानून की पहुँच नहीं है वहां कानून की पहुँच कायम होगी। शनि और मंगल के मेल के कारण यह वर्ष पिछले वर्षों की तुलना में बेहद ही दिलचस्प होगा।
आइए जानते हैं की हिन्दू कैलेंडर के अनुसार इस नव वर्ष पर शनि देव आप पर कृपा का फल बरसाएँगे याँ अपने प्रकोप से आपको परेशान करेंगे।

हिन्दू कैलेंडर 2072 के मास फल के अनुसार 


चैत्र मास (6 मार्च - 4 अप्रैल) 
चैत्र मास में भारी बारिश की संभावना है जिससे आपको कठिनाई हो सकती है। खाने की चीज़ों में भी बढ़ोतरी के आसार हैं। युवाओं के लिए मुश्किल भरा समय हो सकता है। 

वैशाख मास (5 अप्रैल - 4 मई) 
वैशाख मास व्यापारी वर्ग के लिए परेशानी का समय ला सकता है। कम बारिश होने से चीज़ें महँगी होने की संभावना है। तरल पदार्थ जैसे दूध, घी आदि सस्ते होंगे। 

ज्येष्ठ मास (5 मई - 2 जून)
ज्येष्ठ मास से दक्षिण भारत के क्षेत्रों में परेशानी होने के आसार हैं। वस्त्र आदि महँगे होने की संभावना है। जोड़ो का दर्द बना रह सकता है । 

प्रथम आषाढ़ मास (3 जून - 16 जून) 
भारी वर्षा से प्रथम आषाढ़ मास में जन-धन के नुकसान की प्रबल संभावना है। प्राकृतिक आपदाएँ जनजीवन अस्त-व्यस्त कर सकती हैं। बीमारियों में भी वृद्धि हो सकती है। 

द्वितीय आषाढ़ मास (17 जून - 31 जुलाई) 
इस मास में कहीं भारी बारिश और कहीं सूखे की संभावना हो सकती है। खाने-पीने की चीजों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। 

श्रावण मास (1 अगस्त - 29 अगस्त)
भारी बारिश और सूखे से किसानो को परेशानी हो सकती है। राजनैतिक दलों के कारण उठा-पटक का दौर चलेगा। व्यापारी वर्ग के लिए परेशानी भरा समय होने के आसार दिख रहे हैं। 

भाद्रपद मास (30 अगस्त - 28 सितंबर) 
भारी बारिश होने के कारण अनाज के महँगे होने के पूरे आसार हैं। जानवरों के लिए कष्ट भरा समय रह सकता है। आपके मन में भी डर और भय बना रह सकता है। 

अश्विन मास (29 सितंबर - 27 अक्टूबर) 
वर्षा की कमी से चीज़ों के महँगे होने की संभावना है। प्राकृतिक आपदाओं से लोगो को परेशानी हो सकती है। कला वर्ग के लोगों के लिए कठिन समय आ सकता है। 

कार्तिक मास (28 अक्टूबर - 25 नवंबर) 
महँगाई में बढ़ोतरी होने के आसार हैं। कई जगह सूखे के कारण परेशानियाँ आ सकती हैं। भय और डर का समय बना रह सकता है। 

मार्गशीर्ष मास (26 नवंबर - 25 दिसंबर) 
भारी बारिश से होने वाली महँगाई आपको रुला सकती है। व्यापारी वर्ग के लिए वक़्त अनुकूल नही होगा। जानवरों के लिए भी कष्ट भरा समय हो सकता है। 

पौष मास (26 दिसंबर - 24 जनवरी 2016) 
व्यापारियों को पैसे का नुकसान होने के योग बन सकते हैं। लोगों को पौष मास में सुख और ख़ुशी की अनुभूति होगी। 

माघ मास (25 जनवरी - 22 फरवरी) 
खाने की आम वस्तुअों की कीमत में गिरावट होगी। राजनैतिक और प्रशासनिक क्षेत्र के लोगों को नुकसान हो सकता है। अनाज में हानि होने की संभावना हो सकती है। 

फाल्गुन मास (23 फरवरी - 23 मार्च) 
राजनीतिज्ञों और व्यापारियों के लिए कठिन समय बन सकता है। आम लोगों के लिए मिलाजुला समय बना रहेगा। 

चैत्र मास (24 मार्च - 22 अप्रैल) 
तरल पदार्थ सस्ते होंगे। लोगों को सुख की अनुभूति होगी। जानवरों में बीमारियों की संभावना बनी रह सकती है।

संवत 2072 के राजा शनि देव की कृपा आप को राजा और रंक दोनों बनाने के लिए काफ़ी हैं। अभी हम बताते हैं आपको कुछ छोटे-छोटे ऐसे उपाय जिस से शनि देव का आशीष आप पर सदैव बना रहेगा। शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए और उपाय जानने के लिए इसे देखिए- शनि के प्रकोप से बचने के ५ सरल उपाय जानें अभी

इसके अतरिक्त आप शनिदेव को ख़ुश करके उनकी कृपा पाने के लिए नीलम को भी धारण कर सकते हैं। अगर नीलम खरीदने में असमर्थ हैं तो कटैला, जमुनिया या गन मेटल धारण करना श्रेष्ठ होगा। 

नीलम संबंधी अन्य जानकारी प्राप्त करने और इसे ख़रीदने के लिए देखें- नीलम (2 रती), नीलम (5 रती)

विक्रम संवत्सर 2072 में अगर आप श्रद्धा के साथ इन उपायों को करेँगे, तो राजा शनि देव की प्रकोप दृष्टि से बचकर आप उनकी कृपा सहज ही हासिल कर सकते हैं। हम आशा करते हैं की आप इन उपायों को आजमाएँगे और आपका नव वर्ष ख़ुशियों से भरा हुआ बीतेगा। इस बात को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाने के लिए लाइक्स और शेयर ज़रूर करें। आपका साल शुभ रहे। 

एस्ट्रोसेज की तरफ से आप सभी को विक्रम संवतसर 2072 की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!


आज का पर्व!


आज गौरी पूजा और गणगौर का त्यौहार है। यह त्यौहार माँ पार्वती को समर्पित है। अविवाहित लड़कियाँ अपनी मन पसंद का जीवनसाथी पाने के लिए तथा विवाहित औरतें अपने विवाहित जीवन को सुखमय बनाने के लिए माँ पार्वती की पूजा करती हैं।

पाँच दिनों का अशुभ समय पंचक आज ख़तम हो रहा है। कुछ शुभ कार्य जैसे शादियाँ और मुंडन इस अवधि में करना निषेध है लेकिन गृह प्रवेश और भूमि पूजन किया जा सकता है।

आज झूलेलाल जयंती है। यह सिंधी लोगों का त्यौहार है जिसमे वे अपने गुरु उदेरोलाल का जन्मदिन मनाते हैं, जिनको झूलेलाल के नाम से जाना जाता है।

आज मतस्य जयंती है। भगवान विष्णु ने आज के दिन धरती पर पहली बार एक मतस्य के रूप में जन्म लिया था।
आपका दिन शुभ हो!

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शनि के प्रकोप से बचने के 5 सरल उपाय जानें अभी

क्या आपके बनते काम बिगड़ जाते हैं? क्या सारी मेहनत के बावजूद आपको सफलता नहीं मिल रही है? पैसे की तंगी रहती है? क्या आपकी सेहत भी आपका साथ नहीं दे रही है? मुमकिन है कि आप शनि देव की वक्र दृष्टि के शिकार हों। अभी जानिए ५ सरल उपाय जो बचाएंगे आपको शनि के क्रोध से और दिलाएंगे जीवन में क़ामयाबी...

शनि के प्रकोप से बचने के ५ सरल उपाय जानें अभी
शास्त्रों में शनि देव के क्रोध के अनेक उदाहरण मिलते हैं। कहते हैं कि मेघनाद की कुंडली में रावण ने सारे ग्रहों को पकड़कर सबसे शुभ माने जाने वाले ११वें भाव में क़ैद कर दिया था। लेकिन त्रिलोक को जीतने वाला रावण भी शनि देव को रोक न सका और उन्होंने धीरे-से अपना पैर अनिष्ट-कारक १२वें भाव में बढ़ा दिया। शनि देव के इस कार्य की ही वजह से अपराजेय समझा जाने वाला मेघनाद भी आख़िरकार मृत्यु का ग्रास बना।

वैदिक ज्योतिष के मुताबिक़ भिन्न-भिन्न भावों में शनि का फल भी भिन्न-भिन्न होता है। शनि सूर्य-पुत्र के नाम से ख्यात है। कहते हैं कि शनि जिसे चाहे राजा से रंक बना देता है और रंक से राजा। आइए देखते हैं क्या हैं वे ५ अचूक उपाय जो शनि के प्रकोप को शान्त कर उनकी कृपा-दृष्टि को आकर्षित करते हैं –


१. हनुमान चालीसा का पाठ

हनुमान चालीसा का नियमित पाठ शनिदेव के प्रकोप से बचने का रामबाण उपाय है। अगर आप ढैया या साढे साती से गुज़र रहे हैं और शनि द्वारा दिए कष्टों से पीड़ित हैं, तो हनुमान चालीसा आपके लिए अचूक औषधि की तरह है। जनश्रुति है कि हनुमान जी ने शनि देव को लंका में दशग्रीव के बंधन से मुक्त कराया था। ऐसा भी कहा जाता है कि कलियुग में अभिमानवश एक बार शनिदेव हनुमान जी के पास गए और बोले - “तुमने मुझे त्रेता में ज़रूर बचाया था, लेकिन अब यह कलिकाल है। मुझे अपना काम करना ही पड़ता है। इसलिए आज से तुम्हारे ऊपर मेरी साढ़े साती शुरू हो रही है। मैं तुमपर आ रहा हूँ।” यह कहते हुए वे हनुमान जी के मस्तक पर सवार हो गए। शनिदेव के कारण हनुमान जी को सर पर खुजली होने लगी, जिसे मिटाने के लिए उन्होंने सर पर एक विशाल पर्वत रख लिया। जिसके नीचे शनिदेव दब गए और “त्राहि माम् त्राहि माम्” चिल्लाने लगे। उन्होंने हनुमान जी से याचना की और कहा कि वे आगे से उन्हें या उनके भक्तों को कभी परेशान नहीं करेंगे। हनुमान चालीसा हनुमान जी के स्तोत्रों में बहुप्रचलित और अनन्त शक्तिसंपन्न है। इसका पाठ शनि के सभी कष्टों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है।

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२. शनि मंत्र का जाप

कहते हैं कि मन्त्रों में इतनी शक्ति होती है कि उनका सही उपयोग मरे हुए को भी ज़िन्दा कर सकता है। हर देवता का अपना मन्त्र होता है, जिसको विधि-पूर्वक जपना उस देवता को प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीक़ा है। शनि देव के निम्न मंत्र का ४० दिनों में १९,००० बार जप साढ़ेसाती में बहुत लाभ देता है -

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनिश्चराय नमः

शनि-मंत्र के बीज अक्षरों की अपरिमित शक्ति ढैया और साढ़े साती के ताप का शमन करती है। शनिदेव के इस मन्त्र का लाभ सभी को लेना चाहिए। साथ ही दशरथ कृत शनि स्तोत्र भी शनि के दुष्प्रभावों से बचने का बेहतरीन उपाय है।

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३. तिल, तैल और छायापात्र का दान

तिल, तैल और छायापात्र शनिदेव को अत्यन्त प्रिय माने जाते हैं। इन चीज़ों का दान शनि की शान्ति का प्रमुख उपाय है। मान्यता है कि यह दान शनि देव द्वारा दिए जाने वाले कष्टों से निजात दिलाता है। छायापात्र दान की विधि बहुत ही सरल है। मिट्टी के किसी बर्तन में सरसों का तैल लें; उसमें अपनी छाया देखकर उसे दान कर दें। यह दान शनि के आपके ऊपर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को दूर कर उनका आशीर्वाद लाता है।

४. धतूरे की जड़ धारण करें

वैदिक ज्योतिष में विभिन्न जड़ों की मदद से ग्रहों की शान्ति का विधान है। कई ज्योतिषियों का मानना है कि रत्न धारण करना नुक़सान भी पहुँचा सक्ता है, लेकिन जड़ धारण करने से ऐसी आशंका नहीं रहती है। रत्न ग्रह की शक्ति बढ़ाने का काम करते हैं, वहीं जड़ियाँ ग्रहों की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मोड़ने का कार्य करती हैं। शनिदेव को ख़ुश कर उनकी कृपा पाने के लिए ग्रन्थों में धतूरे की जड़ को धारण करने की सलाह दी गई है। धतूरे की जड़ का छोटा-सा टुकड़ा गले या हाथ में बांधकर धारण किया जा सकता है। इस जड़ी को धारण करने से शनि की ऊर्जा आपको सकारात्मक रूप से मिलने लगेगी और जल्दी ही आपको ख़ुद अन्तर महसूस होगा।

धतूरे की जड़ संबंधी अन्य जानकारी प्राप्त करने और इसे ख़रीदने के लिए देखें - धतूरे की जड़

५. सात मुखी रुद्राक्ष धारण करें

जड़ियों की ही तरह रुद्राक्ष को भी हानि रहित उपाय की मान्यता प्राप्त है। सात मुखी रुद्राक्ष धारण करना न सिर्फ़ भगवान शिव को प्रसन्न करता है, बल्कि शनिदेव का आशीर्वाद भी दिलाता है। पुराणों के अनुसार सात मुखी रुद्राक्ष धारण करने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं रहती है और लक्ष्मी मैया की कृपा हमेशा बनी रहती है। साथ ही सेहत से जुड़ी समस्याओं में भी इसे बहुत प्रभावी माना जाता है। इस रुद्राक्ष को सोमवार या शनिवार के दिन गंगा जल से धोकर धारण करने से शनि जनित कष्टों से छुटकारा मिलता है और समृद्धि प्राप्त होती है।

सात मुखी रुद्राक्ष संबंधी अन्य जानकारी प्राप्त करने और इसे ख़रीदने के लिए देखें - सात मुखी रुद्राक्ष

यहाँ बताए गए ये छोटे-छोटे उपाय करने में सरल हैं और जल्दी असर दिखाते हैं। अगर श्रद्धा के साथ इन उपायों को किया जाए, तो शनि देव की वक्र दृष्टि से बचकर उनकी कृपा सहज ही हासिल की जा सकती है। इन सरल उपायों को काम में लाएँ और शनि देव के आशीष से अपना जीवन सुखमय बनाएँ। साथ ही जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रत्येक शनिवार को करें ये ५ काम, जिससे मिलेगी आपको शनिदेव की कृपा।


विशेष ग्रह गोचर!


24 तारीख़ को बुध ग्रह धनु राशि में गोचर कर चुका है। यह ग्रह गोचर हर राशि पर भिन्न-भिन्न प्रभाव डालेगा। यदि आप जानना चाहते हैं कि आपके जीवन पर इसका क्या प्रभाव होगा, तो अभी पढ़ें -- बुध का धनु में गोचर

ॐ शनैश्चराय नमः
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दिल्ली विधान सभा चुनाव 2015 - एक ज्योतिषीय विश्लेषण

दिल्ली के चुनाव के परिणामों को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं है। दिल्ली के मुख्य मंत्री पद के लिए इस बार अरविन्द केजरीवाल का सीधा मुकाबला केवल किरण बेदी से ना होकर नरेंद्र मोदी से भी है । “पं. दीपक दूबे” ज्योतिष के माध्यम से बताएंगे कौन जीत सकता है दिल्ली के मुख्य मंत्री की कुर्सी इस बार। 

janiye delhi ke chunavo ka bhavishya jyotish dwara.

दिल्ली के चुनाव के परिणामों को लेकर इस बार किसी भी प्रकार के निष्कर्ष पर पहुंचना अत्यंत ही टेढ़ी खीर है, और यही बात इस चुनाव को अत्यधिक रोमांचक बनाती है। परिस्थितियों को देखते हुए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना आसान नहीं है। इस बार, मैंने भी इस चुनाव पर अपना ज्योतिषीय विचार रखने का प्रयास किया है। सामान्यतया हम किसी भी चुनाव में वहाँ के प्रमुख उम्मीदवारों का ही विश्लेषण करते हैं, परन्तु इस बार का चुनाव कुछ खास है, यहाँ अगर देखा जाये तो जहाँ एक और चुनाव के केंद्र में केजरीवाल हैं तो दूसरी ओर भाजपा दिल्ली की मुख्यमंत्री की प्रत्याशी किरण बेदी, परन्तु इस बार हम सीधे - सीधे केवल किरण बेदी और केजरीवाल का ही विश्लेषण नहीं कर सकते, और ना ही इससे किसी सार्थक परिणाम पर पहुँच सकते हैं, क्योंकि इस बार मुख्य लड़ाई केजरीवाल और मोदी के बीच है, ना कि किरण बेदी के साथ। किरण बेदी सिर्फ एक प्रतीक के रूप में हैं, इस चुनाव के परिणामों का सबसे अधिक प्रभाव अरविन्द केजरीवाल और नरेंदर मोदी पर पड़ने वाला है, और इन्हीं वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए मैंने ज्योतिषीय विश्लेषण करने का प्रयास किया है।चूँकि कांग्रेस की स्थिति अत्यंत ही नाज़ुक है अतः मैंने उसे अपने विश्लेषण में शामिल नहीं किया है -

आइये सबसे पहले अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी और नरेंदर मोदी की लग्न कुंडली, वर्तमान दशा अंतर दशा तथा को देखा जाये -

जन्म के समय तीनों नेताओं के लग्न कुंडली में ग्रहों की स्थिति


अरविन्द केजरीवाल

किरण बेदी


नरेंदर मोदी 


यहाँ अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी के जन्म का विवरण एस्ट्रोसेज.कॉम के अनुसार है, परन्तु नरेंदर मोदी की कुंडली उनके प्रचलित जन्म तारीख 17 सितम्बर, 1950 को ना मानकर मेरी गणना के अनुसार 17, सितम्बर, 1949 के अनुसार है। साथ ही यहाँ यह भी सुनिश्चित कर दूँ की कुंडलियों का विश्लेषण, उपरोक्त नेताओं के ज्ञात जन्म से सम्बंधित तथ्यों के आधार पर है, और मैं इसकी सटिकता का दावा नहीं करता।

मतदान - 7 फरवरी को लग्न गोचर


अरविन्द केजरीवाल


किरण बेदी


नरेंदर मोदी 


विशेष: चन्द्रमा इस दिन दो राशियों - सिंह और कन्या में भ्रमण करेगा, अतः लग्न लेने की वजह से चन्द्रमा का राशि परिवर्तन दिखेगा। 
चुनाव नतीजे - 10 फरवरी को लग्न गोचर 

अरविन्द केजरीवाल



किरण बेदी


नरेंदर मोदी


वर्तमान में तीनों नेताओं की दशा और अंतर दशा


दशा (7 फरवरी , 2015 को )


अरविन्द केजरीवाल: 4 फरवरी से 12 फ़रवरी के बीच गुरु की महादशा, शुक्र का अंतर, केतु का प्रत्यंतर और गुरु की सूक्ष्म दशा है।

किरण बेदी : 7 फरवरी तक सूर्य की महादशा, बुध का अंतर, गुरु का प्रत्यंतर और राहु की सूक्ष्म दशा है, और 10 फरवरी को सूर्य - बुध -शनि और शनि है।

नरेंदर मोदी: 7 फरवरी तक शुक्र की महादशा, मंगल का अंतर, शनि का प्रत्यंतर और चन्द्रमा की सूक्ष्म दशा है, और 10 फरवरी को शुक्र - मंगल - शनि और मंगल है।

अब कुंडली, दशा और गोचर के अनुसार विश्लेषण


अरविदं केजरीवाल: केजरीवाल की कुंडली में भाग्येश और राज्येश शनि है जो वर्तमान में सप्तम भाव में बैठकर भाग्य स्थान और मित्र दृष्टि से लग्न को देख रहा है। लग्नेश शुक्र और मंगल दोनों ही गोचर में दशम भाव में बैठे हैं और सूर्य तथा बुध की युति भाग्य स्थान पर है, पराक्रम भाव पर गुरु उच्च का है और भाग्य स्थान को सीधी दृष्टि से देख रहा है।

किरण बेदी: बेदी की कुंडली में भाग्येश शुक्र है तो राज्येश बुध, वर्तमान में गोचर में राहु लग्न में है, बुध राज्येश होकर अपने से अष्ठम भाव, अर्थात पंचम में है और भाग्येश शुक्र छठें भाव में बैठकर भाग्य भंग योग का सृजन कर रहा है। केंद्र में कोई भी शुभ ग्रह नहीं है, राहु और केतु केंद्र में तो हैं परन्तु लग्न में बैठा राहु सोचने - समझने और बोलने की शक्ति को दूषित कर देता है और नकारात्मक प्रभाव ही देता है।

नरेंदर मोदी: मोदी की कुंडली में भाग्येश बुध है तो राज्येश चन्द्रमा। अगर दशाओं की बात की जाये तो वर्तमान में सबसे मज़बूत महादशा मोदी की ही चल रही है जो सर्वविदित है और उसे कहने की आवश्यकता नहीं है। गोचर में भी मोदी की कुंडली में उच्च का गुरु तो सूर्य और बुध केन्द्रस्थ है, पंचम भाव में मंगल और शुक्र बुद्धि और पराक्रम का अद्भुत ताल - मेल बैठा रहा है।

निष्कर्ष 


यहाँ तीनों कुंडलियों को गौर से देखा जाये तो ग्रहों की दृष्टि से किरण बेदी की कुंडली बेहद कमज़ोर पड़ रही है केजरीवाल के सामने, यदि केवल किरण बेदी की कुंडली को देखा जाये तो उनका जीतना असंभव था, परन्तु जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस चुनाव में किरण बेदी प्रतिक स्वरूप ही हैं मात्र, अतः विपक्ष के रूप में केवल मोदी को मानना ही उचित होगा और इस आधार पर मोदी की जीत तय है, भले ही भाजपा जीत जाये परन्तु किरण बेदी के लिए इस चुनाव का लड़ना उनके भविष्य के लिए सम्भवतः अच्छा नहीं होगा।

अब यदि सीटों का अंदाज़ा लगाया जाये तो अंतर बहुत ही कम रहने वाला है, 10 फरवरी को राज्येश चन्द्रमा के लग्न में होने के कारण मोदी की जीत संभावित है, परन्तु यह जीत संभवतः पसीना छुड़ा देने वाली होगी क्योंकि केजरीवाल के ग्रह भी अत्यंत प्रभावशाली हैं। कुल मिलाकर बहुत कम अंतर से और येन - केन - प्रकारेण भाजपा सत्ता लेने में कामयाब हो सकती है।

परिणाम


किरण बेदी: राजनितिक भविष्य अच्छा नहीं है।

नरेंदर मोदी: येन - केन - प्रकारेण विजय संभावित है।

अरविन्द केजरीवाल: हार कर भी विजेता बनने की संभावना है। (जीत की संभावना से इंकार नहीं कर सकता)

सीटों की बात की जाये तो 30 से ऊपर दोनों

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सूर्य ग्रहण दिवाली पर: कैसा रहेगा आपकी राशि के लिए

23 - 24 अक्टूबर, 2014 की मध्य रात्रि में सूर्य ग्रहण तुला राशि में लग रहा है। ज्योतिष के मुताबिक यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, परन्तु कहीं न कहीं इस ग्रहण से हम सबकी राशियाँ अवश्य जुड़ी हैं। पं. दीपक दूबे द्वारा जानिए सूर्य ग्रहण का प्रभाव आपकी राशि पर। 

Surya Grahan pad raha hai Diwali par, jaanie kya honge iske prabhav.

सूर्य ग्रहण 2014: क्यों है यह ख़ास?


शिव की पवित्र नगरी वाराणसी के रहने वाले पण्डित दीपक दूबे अनन्य शिवभक्त, प्रखर ज्योतिषी और अनुष्ठानों के मर्मज्ञ हैं। साथ ही वे कर्मकाण्ड, मन्त्र-तन्त्र और वास्तु के गहन अध्येता भी हैं। उन्हें ज्योतिष और कर्मकाण्ड का ज्ञान अपने पिता से हासिल हुआ, जो स्वयं प्रकाण्ड ज्योतिषी और अनन्य काली-उपासक हैं। वे विभिन्न टीवी और एफ़एम चर्चाओं में ज्योतिषी के तौर पर प्रायः आमंत्रित किए जाते रहे हैं। मनोविज्ञान में स्नातक, पण्डित दीपक दूबे, कई पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी कर चुके हैं।
चन्द्र ग्रहण के 16 दिन बाद एक बार पुनः ग्रहण लग रहा है और इस बार दिवाली के दिन यह सूर्य ग्रहण है। यह ग्रहण तुला राशि में और चित्रा नक्षत्र में लग रहा है। अतः वे जातक जो तुला राशि/लग्न और चित्रा नक्षत्र में पैदा हुए हों, अधिक प्रभावित होंगे। भारतीय समय के अनुसार यह ग्रहण 23 - 24 अक्टूबर की मध्य रात्रि में लगभग 01:07 से प्रारम्भ होकर 04:17 तक समाप्त हो जायेगा, अतः भारत में धार्मिक दृष्टिकोण से इसकी मान्यता नहीं है। परन्तु आकाश में यह घटना घटित होगी, अतः इसका प्रभाव पृथ्वी के वातावरण और जीवों पर अवश्य पड़ेगा, साथ ही इस ग्रहण का प्रभाव अगले 30 दिनों तक रहेगा।


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सूर्य ग्रहण 2014: ग्रहों की स्थितियाँ 


(भारतीय समयानुसार रात्रि के 1:30 am)



आप देख रहे हैं कि उदित राशि सूर्य की सिंह राशि है जो स्वयं केतु की नक्षत्र में है, शुक्र, चन्द्रमा, सूर्य और राहु, मंगल के नक्षत्र में हैं, स्वयं मंगल केतु के नक्षत्र में है। शनि उच्च का है और मंगल तथा गुरु पर दृष्टि रखे हुए है। गुरु पर मंगल की भी नीच दृष्टि है। अर्थात, चन्द्रमा, अमावस्या होने के कारण अनुपस्थित है, सूर्य नीच राशि में ग्रहण, और उच्च के शनि के कारण अत्यंत दूषित और प्रभावहीन है। केतु और शनि के कारण मंगल अत्यंत उग्र है। ऐसी परिस्थिति में क्या होगा प्रकृति और मनुष्यों पर प्रभाव, आइये जानते हैं:

सूर्य ग्रहण 2014: प्रकृति और देश पर प्रभाव 

ग्रहों के स्थितियाँ अत्यंत प्रतिकूल हैं, अग्नि और वायु तत्वों के प्रभावी होने के कारण भूकम्प, तूफान, सुनामी जैसे विनाशकारी आपदाओं के आने की आशंका अधिक प्रबल है। पश्चिमोत्तर क्षेत्रों/देशों में युद्ध या किसी धार्मिक /सामाजिक उन्माद के कारण अत्यधिक मात्रा में रक्तपात की प्रबल सम्भावना बन रही है। 

सूर्य ग्रहण 2014: राशियों पर प्रभाव 


सूर्य ग्रहण और दिवाली की यह युति आपके जीवन में कुछ-न-कुछ बदलाव तो ज़रूर लाएगी। चलिए अब जानते हैं कि कैसी रहेगी यह सूर्य ग्रहण के साथ आई दिवाली आपके लिए। यदि आपका फलादेश कुछ ख़ास अच्छा समाचार लिए हुए न हो, तो निराश न होएं। क्योंकि आपकी कुंडली के अनुसार ग्रहों की स्थिति अलग-अलग परिणाम भी देती है।

मेष: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल 


आर्थिक परेशानियाँ, कार्य व्यापार में धोखा और जीवन साथी के साथ वैचारिक मतभेद होने की सम्भावना रहेगी। साथ ही संतान सम्बन्धी कोई परेशानी भी पैदा हो सकती है। 

वृषभ: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


शत्रुओं पर विजय, केस - मुकदमे में विजय और कर्ज़ से मुक्ति मिलेगी। परन्तु किसी को कर्ज़ देने से बचें। 

मिथुन: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


शिक्षा - प्रतियोगिता में असफलता तथा भाई को स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्या हो सकती है। संतान के कारण भी चिंता हो सकती है। गर्भवती महिलाओं के लिए बहुत ही सावधानी का समय है।

कर्क: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


अचानक धन हानि होगी। बिना वजह वाद - विवाद होगा। किसी अपने के बिछड़ने का दुःख हो सकता है। 

सिंह: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


मन बहुत अशांत रहेगा। कोई दुखद समाचार प्राप्त होने की सम्भावना बन रही है। यात्रा के दौरान सावधानी बरतें। 

कन्या: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


आर्थिक हानि, किसी अपने के कारण सम्मान को ठेस पहुँच सकता है। वाणी दूषित होगी। अहंकार से बचें। 

तुला: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


आप की ही राशि पर ग्रहण है, मन विचलित रहेगा, विचार दूषित हो सकते हैं, सोचने - समझने की शक्ति कुछ समय तक कमज़ोर रहेगी, अतः आवश्यक निर्णय कुछ समय के लिए टाल दें।

वृश्चिक: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


अनावश्यक यात्रा, अचानक धन खर्च, पिता के स्वास्थ्य की समस्या तथा क़ानूनी परेशानियाँ पैदा हो सकती हैं, अनावश्यक वाद - विवाद से बचें। अपने उच्च अधिकारियों से सतर्क रहें। 

धनु: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


भाग्य पक्ष अत्यंत कमज़ोर है, अतः ऐसा कोई भी कार्य ना करें जो सिर्फ आपके भाग्य पर निर्भर हो। सट्टा - लॉटरी से दूरी बनायें रखें और आर्थिक जोखिम ना लें। 

मकर: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


मान हानि की सम्भावना बनेगी। यदि सरकारी क्षेत्र से जुड़े कार्यों से सम्बंधित हैं तो अनुकूल समय नहीं है। वैसे स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं से निजात मिलेगा। 

कुम्भ: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


जीवन साथी के स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ परेशान करेंगी। भाग्य पक्ष भी कमज़ोर रहेगा। अपने कार्य क्षेत्र में भी सावधानी बरतें, धोखा मिल सकता है। 

मीन: सूर्य ग्रहण 2014 राशिफल


स्वास्थ्य के मामले में अत्यंत नाज़ुक समय है, अग्नि से भय बनेगा और साथ ही घटना - दुर्घटना का भी योग बन रहा है, अतः सावधानी बरतें। बिना वजह कर्ज़ लेकर कुछ खरीदने से बचें अन्यथा चुकाना मुश्किल होगा। 

विशेष: वैसे आप किसी भी राशि के हों, ग्रहण के दिन पूजा, दान, भूखे लोगों को भोजन और स्वतः भी शुभ कर्मरत रहें, क्योंकि इस दिन प्राकृतिक आपदाओं तथा घटना-दुर्घटना होने की सम्भावना अन्य दिनों से अधिक रहती है। अतः अपने को अच्छे कार्यों में लगाये रखें।

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महात्मा गांधी तथा लाल बहादुर शास्त्री: ज्योतिषीय विश्लेषण

आज अक्टूबर 2 को दो महानतम व्यक्तियों, महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री का जन्मदिन पूरे भारतवर्ष में मनाया जाएगा। आइये पं. हनुमान मिश्रा के साथ जानते हैं कि ऐसी कौन सी बातें हैं जो इन दोनों को इतना महान बनाती हैं। 


महात्मा गांधी: भारत के राष्ट्रपिता 


2 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्म दिवस हम भारतीय-जन बड़े भाव से मनाते हैं। वो महात्मा गांधी जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक थे। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था। मोहनदास की माता का नाम पुतलीबाई था। पुतलीबाई करमचंद गांधी जी की चौथी पत्नी थीं और मोहनदास अपनी माँ की अंतिम संतान थे।


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वैसे तो एस्ट्रोसेज पर इनके बारे में पहले भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है अत: इस बार इनके जन्मदिन पर हम इनकी वकालत के बारे में चर्चा करना चाहेंगे। वकील बनने के लिए मुख्यतः संबंधित ग्रह गुरु, बुध, शनि, शुक्र और मंगल हैं। गुरु, शुक्र अच्छी विवेक शक्ति देते हैं। बुध वाणी का कारक है, वहीं न्याय तथा किसी मामले की तह तक जाने का काम शनि करवा देता है। मंगल पराक्रम और आत्मविश्वास का कारक माना गया है। यदि किसी की कुण्डली में यह सारे ग्रह अनुकूल और मज़बूत हों तो जातक बहुत अच्छा वकील बनता है। इसके विपरीत होने पर कुछ न कुछ कमियाँ आ जाती हैं। इसके अलावा द्वितीय, छठा, सप्तम तथा नवम भाव एवम् कर्म भाव भी विचारणीय होते हैं। आइए देखते हैं कि गांधी जी की कुण्डली में संबंधित ग्रहों का क्या हाल है।


महात्मा गांधी की कुंडली में कानूनी शिक्षा से संबंधित लगभग सभी ग्रह सुव्यवस्थित हैं। बुध, शुक्र, मंगल और गुरु केन्द्र में हैं। शनि वाणी स्थान में है, तुला लग्न अपने आप में निर्णय करने के मामले में अच्छी लग्न मानी गई है। इन सब ग्रह योगों के कारण ही महात्मा गांधी ने कानून की पढ़ाई के साथ ही बैरिस्टर के रूप में प्रैक्टिस भी की। हाँ यह बात और है कि शनि की दूसरे भाव में स्थिति के कारण वह कटुवक्ता से और गलत और झूठे मुकदमों को लड़के के लिए कड़े शब्दों में मना कर देते थे। सारांश यह कि भले ही महात्मा गांधी ने अपने जीवन काल में अधिक मुकदमें न लड़े हों लेकिन वास्तव में वह एक अच्छे और जानकार वकील थे। कुण्डली में उपस्थित अन्य योगों के कारण उनका यश चिरकाल तक बना रहेगा।

लाल बहादुर शास्त्री जी को बनाया भद्र योग ने भद्रपुरुष


शारदा प्रसाद श्रीवास्तव जी को माँ शारदा (मैहर स्थित एक देवी) ने वाकई एक ऐसा प्रसाद दिया जिसे पाकर उनका जीवन धन्य हो गया। जी हाँ हम बात कर रहे हैं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी की। उनके पिता का नाम शारदा प्रसाद श्रीवास्तव था। वह उत्तर प्रदेश के मुगलसराय के रहने वाले थे। शारदा प्रसाद नाम का अर्थ होता है शारदा देवी का प्रसाद। शारदा देवी माँ सरस्वती का ही रूप मानी जाती हैं। उनका मंदिर मैहर नामक स्थान में है। सम्भवत: यह उनका इकलौता मंदिर है। अब क्योंकि नाम शारदा प्रसाद और पेशा शिक्षण तो माँ शारदा की कृपा आनी स्वाभाविक है। उसी कृपा के फलस्वरूप शारदा प्रसाद जी को लाल बहादुर नामक बालक रूप रत्न प्राप्त हुआ।


धनु लग्न में जन्मे लाल बहादुर जी का लग्नेश पंचम भाव में है। लग्नेश का बुद्धि भाव से सम्बंध होने के कारण जातक का बुद्धिमान होना स्वाभाविक है। साथ ही लग्नेश बृहस्पति है, अत: बुद्धिमत्ता और विद्वता दोनों का संगम इनके व्यक्तित्त्व में देखा जाना स्वाभाविक है। इनकी बुद्धिमत्ता का एक उदाहरण आपके सामने रखना चाहूँगा। जब शास्त्री जी उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री थे तो क्रिकेट मैच के दौरान पुलिस ने स्टेडियम में छात्रों पर लाठी चार्ज कर दिया। छात्र आक्रोशित हुए और छात्र संघ के अध्यक्ष के नेतृत्व में छात्रों का एक प्रतिनिधि मंडल शास्त्री जी से मिला। छात्रों ने पुलिस को हटाने के सम्बन्ध में आग्रह किया और कहा कि गृहमंत्री जी कल से लाल टोपी खेल के मैदान में नहीं दिखाई देनी चाहिए, क्योंकि उस समय पुलिस की टोपी लाल रंग की हुआ करती थी। शास्त्री जी ने नम्र भाव से उत्तर दिया ठीक है कल से लाल टोपी मैदान में नहीं दिखेगी। इसके बाद शास्त्री जी ने लखनऊ के सारे दर्ज़ियों को लगा कर रात भर में खाकी टोपियाँ सिलवा दीं। सुबह मैदान में पुलिस तो आई लेकिन लाल टोपी कहीं नजर नहीं आई। हालांकि बाद छात्र दोबारा शास्त्री जी से मिले और शास्त्री ने उन्हें अपने ढंग से समाधान दिलाया लेकिन इस घटना से शास्त्री जी कि बुद्धिमत्ता प्रकट होती है। चीज़ों का सहजता से समाधान देने की योग्यता प्रकट होती है और यह योग्यता शास्त्री जी को बुध ग्रह के कारण मिली।

शास्त्री जी की कुंडली में बुध उच्चावस्था में होकर कर्म स्थान यानी कि राज्य भाव में बैठा है। जो कि उन्हें स्वच्छ राजनीति का अच्छा ज्ञान देता है। इस योग के फल के बारे में कहा गया है कि इस योग वाला जाता विपुल प्रज्ञा वाला और यशस्वी होता है। वह अपनी कार्यशैली और बातों के कारण लोगों में प्रशंसा का पात्र बनता है। इतना ही नहीं ऐसा जातक सिंह के समान पराक्रमी और शत्रुओं का विनाश करने वाला होता है। इसका उदाहरण भी शास्त्री जी के जीवन में देखने को मिला सन १९६५ ई.के. युद्ध में पहली बार देश ने शत्रु की धरती पर धावा बोला और पाकिस्तान से सरगोधा व सियालकोट छीन लिये थे साथ जैसे ही हम लाहौर में प्रवेश करने ही वाले थे जब रूस केे अनुरोध पर युद्ध -विराम करना पड़ा। यानी भद्र योग ने शास्त्री जी को पूर्ण लाभ दिया। वो स्वयं तो भद्र थे ही साथ ही अभद्र लोगों को ऐसा सबक सिखाते थे कि वो भी भद्र बनने का मन बना लेते थे।

यानी कि बुध ने स्वयं अथवा अन्य ग्रहों का सहयोग लेकर शास्त्री जी को भारतवर्ष का प्रधानमंत्री होने का गौरव प्रदान किया। जैसे नवमेश एवं दशमेश का दशम भाव में योग एक श्रेष्ठ राजयोग माना जाता है। दशम भाव राज्य भाव एवं नवम भाव भाग्य भाव है। दोनों का यह संयोग, केंद्र, या त्रिकोण में होने से, उत्तम योग बनाता है। शास्त्री जी की कुंडली में नवमेश सूर्य दशमेश बुध के साथ दशम में है। अत: उनके रूप में भारत को दूसरा व महान व्यक्तित्त्व वाला प्रधामंत्री मिला।



आज का पर्व!


आज दुर्गा पूजा का चौथा दिन है। इस दिन को पूरी श्रद्धा के साथ स्त्री शक्ति के प्रतीक को अर्पित करें।

आज के दिन ही अन्नपूर्णा परिक्रमा की समाप्ति होगी।

आपका दिन मंगलमय हो! 

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शिक्षक दिवस: एक आदर्श गुरु कौन है?

प्रत्येक वर्ष 5 सितम्बर को हम "शिक्षक दिवस" के दिन उन महान विभूतियों को नमन तथा याद करते हैं, जिन्होंने हमें इस जीवन-पथ पर चलने का गुण सिखाया। आइये, आज इस पवित्र दिन पर जानते हैं ज्योतिषविद पं. दीपक दूबे के माध्यम से  - क्या है शिक्षक दिवस? कौन से ऐसे गुण हैं जो किसी इन्सान को बनाते हैं महान और आदर्श गुरु? और ग्रहों की क्या होती है भूमिका किसी को महान गुरु बनाने में? 

शिक्षक दिवस हर साल सितम्बर ५ को मनाया जाता है।


गुरु:


शिव की पवित्र नगरी वाराणसी के रहने वाले पण्डित दीपक दूबे अनन्य शिवभक्त, प्रखर ज्योतिषी और अनुष्ठानों के मर्मज्ञ हैं। साथ ही वे कर्मकाण्ड, मन्त्र-तन्त्र और वास्तु के गहन अध्येता भी हैं। उन्हें ज्योतिष और कर्मकाण्ड का ज्ञान अपने पिता से हासिल हुआ, जो स्वयं प्रकाण्ड ज्योतिषी और अनन्य काली-उपासक हैं। वे विभिन्न टीवी और एफ़एम चर्चाओं में ज्योतिषी के तौर पर प्रायः आमंत्रित किए जाते रहे हैं। मनोविज्ञान में स्नातक, पण्डित दीपक दूबे, कई पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी कर चुके हैं।
गुरु, अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला। अंधकार यानि की अज्ञानता और प्रकाश अर्थात ज्ञान। गुरु, हमारे जीवन में आना वाली वह महान विभूति है जो हमें अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने का सामर्थ्य रखता है। यह गुण सबमें विद्यमान नहीं होता। एक सच्चा गुरु वह बन सकता है जो द्वेष और ईर्ष्या से परे हो, जो ज्ञान रूपी अमृत देने के लिए अपनी सुध-बुध भुला बैठे, उससे ज्ञान पाने वाला यदि उससे भी अधिक सामर्थ्यवान बन जाए तो भी गुरु ही सबसे अधिक प्रसन्न हो। अर्थात वही व्यक्ति सच्चा गुरु बन सकता है जो क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष तथा स्वार्थ से परे हो तथा भटके हुए प्राणियों को सही रास्ता दिखाने का सामर्थ्य रखता हो। यहाँ ज्ञान का तात्पर्य केवल किताबी ज्ञान से ही नहीं अपितु जीवन का हर वो क्षेत्र जहाँ हमें पथ प्रदर्शक की आवश्यकता पड़ती है और जो हमें उस क्षण मार्ग दिखाए। किसी भी व्यक्ति की पहली गुरु उसको जन्म देने वाली माँ ही होती है। 

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शिक्षक दिवस क्या है ?


भारत में शिक्षक दिवस हर साल 5 सितम्बर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस के दिन मनाया जाता है। वैसे तो यह दिन शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तियों को याद करने तथा सम्मानित करने का होता है, परन्तु मेरा मानना है कि इस दिन हमें उन महान विभूतियों को भी याद करना चाहिए जिनका योगदान हमें सच्चे मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करने में भी हो। इस श्रेणी में हम भारत की पहली महिला शिक्षक सावित्री बाई फूले, स्वामी विवेकानंद, मदर टेरेसा, गुरु रविन्द्र नाथ टैगोर, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा आध्यात्मिक गुरुओं में संत ज्ञानेश्वर, गुरु नानक, गुरु गोविन्द सिंह और भी बहुत सी ऐसी महान विभूतियाँ हैं जिन्हे हम महान गुरुओं की श्रेणी में रखते हैं। 

गुरु और ज्योतिष 


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्यक्ति में पाये जाने वाले सभी गुण किसी ना किसी ग्रह के प्रभाव के कारण ही होते हैं। जैसा की मैंने पहले कहा कि सच्चे गुरु में क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि जैसे दुर्गुण नहीं होने चाहिए। एक सच्चे गुरु के अंदर ज्ञान, दया, क्षमा, तथा अपने ज्ञान को व्यक्त करने की क्षमता होनी चाहिए। 


यदि ज्योतिष के दृष्टिकोण से देखें तो एक सच्चे गुरु की कुंडली में बृहस्पति ग्रह जिसे स्वयं भी गुरु कहा जाता है, की स्थिति अच्छी होनी चाहिए। बुद्धि का कारक बुध और विशाल ह्रदय का कारक सूर्य भी अच्छी स्थिति या सूर्य-बुध युति होनी चाहिए। लग्न या पंचम से बृहस्पति का सम्बन्ध अवश्य होना चाहिए और लग्न राहु, केतु, मंगल, और शनि के प्रभाव में नहीं होना चाहिए। 

आइए अब कुछ महान विभूतियाँ जिन्हे हम पथ-प्रदर्शक के रूप में भी जानते हैं उनकी कुंडलियों पर नज़र डाली जाय, जिससे यह सिद्ध हो सके कि किसी को अच्छा गुरु बनाने में ग्रहों का क्या खेल है। 

कुछ महान विभूतियाँ और उनकी कुंडली 


सर्वप्रथम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की कुंडली देखते हैं -



धनु लग्न अर्थात बृहस्पति की राशि, भाग्य स्थान पर अपनी ही राशि का सिंहस्थ सूर्य, केंद्र में उच्च का बुध, शुक्र के साथ। 

स्वामी विवेकानंद



स्वामी विवेकानंद जी की कुंडली में धनु लग्न जो स्वयं गुरु की ही राशि है, लग्न में भाग्येश सूर्य, द्वितीय भाव में बुध और शुक्र की युति अर्थात अत्यंत ही ओजस्वी वाणी। पंचम भाव में मेष का मंगल जिस पर गुरु की सीधी दृष्टि। 

रविन्द्र नाथ टैगोर 



श्री रविन्द्र नाथ टैगोर की कुंडली भी बृहस्पति की राशि अर्थात मीन लग्न की है जिसमें चन्द्रमा विराजमान हैं। द्वितीय भाव में उच्च का सूर्य साथ में बुध और शुक्र भी है। पंचम भाव में उच्च का गुरु स्थित है। 

मदर टेरेसा 



एक बार पुनः देखने को मिल रहा है कि मदर टेरेसा की कुंडली भी बृहस्पति की राशि वाली है अर्थात धनु लग्न की है। दशम भाव में उच्च का बुध और साथ में गुरु स्थित है। 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर 




भारत के संविधान के रचयिता डॉ. भीमराव अम्बेडकर की कुंडली भी मीन लग्न की है अर्थात गुरु की हैं। द्वितीय भाव में उच्च का सूर्य, बुध के साथ हैं। 

डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम 



हमारे पूर्व राष्ट्रपति श्री अब्दुल कलाम की कुंडली में गुरु लग्नस्थ वो भी उच्च का है। उच्च का बुध, सूर्य के साथ हैं। शुक्र के साथ चतुर्थ में स्थित मंगल की दशम भाव पर यानि स्वराशि पर दृष्टि है ।

यहाँ पर इन सभी कुंडलियों में एक समानता देखने को मिल रही है और वह है बृहस्पति का लग्न से सीधा सम्बन्ध, या तो लग्न स्वयं बृहस्पति की है या स्वयं बृहस्पति लग्न में है। दूसरा बुध और सूर्य की युति भी लगभग सभी में है अधिकांश में बुध उच्च का है। वैसे भी गुरु, शुक्र और बुध ज्ञान के ही ग्रह माने जाते हैं और इनमें भी गुरु सर्वोपरि है। 

एक सच्चा और अच्छा गुरु बनने के लिए पहले एक अच्छा शिष्य भी बनना होता है। आइये शिक्षक दिवस पर हम सभी अपने गुरुजनों को नमन करते हुए एक अच्छा शिष्य बनने का संकल्प लें। 

ॐ नमः शिवाय 

ज्योतिषविद पं. दीपक दूबे

आज का पर्व!


आज पद्मा एकादशी का पावन त्यौहार है। आज के दिन भगवान विष्णु की पूजा करें और अपने सभी पिछले जन्म के पापों से मुक्ति पाएँ। पद्मा एकादशी का सुफल आपको सुखद जीवन की ओर ले जाएगा।

आज जल झूलन एकादशी का भी पर्व है। जल झूलन एकादशी मुख्यतः राजस्थान के जयपुर शहर में मनाई जाती है। इस दिन जयपुर के लोग अपने आपको इस एकादशी के रंगो में रंग लेते हैं।

आज अंतराष्ट्रीय करुणा दिवस है। ज़रूरत मंद लोगों को दान देकर आज का दिन मनाएँ। आइये हम आने वाले समय को और सुखद बनाने का प्रण लें और ज़रूरतमंदों की मदद करें।

आज यानि सितम्बर 5, 2014 के दिन मंगल का वृश्चिक राशि में गोचर हो रहा है। अपनी राशि पर इसके होने वाले प्रभावों को पढ़ें और अपने समय को नियोजित करें।
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आने वाला है महाविनाश का दिन - भाग १

महाविनाश के कई चेहरे देखे हैं इस भूमि ने, पर इससे पहले इतना बड़ा महाविनाश कभी नहीं देखा होगा। यहाँ तक कि डायनासॉर की दुनिया ख़तम होने से पहले भी ऐसा विनाश न हुआ होगा। हाँ, वह पृथ्वी पर महाविनाश ही था। अब एक और भयावह महाविनाश की संभावनाएं बन रही हैं। आइए जानें पं. दीपक दुबे के शब्दों में कि कैसा होगा यह विनाश।


होगा महाविनाश! धरती और आसमान काँप उठेंगे! प्रकृति का सबसे भयानक रूप देखने को मिलेगा! ऐसा योग ज्ञात हजारों वर्षों में कभी नहीं आया! यह ऐसा समय होगा, जैसे सृष्टि का रचयिता इसे स्वतः ख़त्म करना चाहता हो! अब तक के ज्ञात तथ्यों और ग्रहों की स्थिति के आधार पर मैं यह कह सकता हूँ कि, महाभारत, दोनों विश्व युद्ध, अब तक के सबसे भयानक समुद्री तूफान, अब तक के सबसे शक्तिशाली भूकम्प, किसी भी समय ग्रहों की युति और योग इतना भयावह नहीं था।

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भूगर्भ शास्त्री तथा वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी अपना ध्रुव बदलती है जो लाखों या करोड़ों वर्षों में एक बार होता है। आज के हिमालय और द्वीप कभी जल के अंदर विलुप्त थे और हिमालय से ऊँचे पर्वत वर्तमान में जल में विलुप्त हैं। वैज्ञानिकों के कथन को आधार मानकर यह कहा जा सकता है कि जब कभी भी ऐसा मंजर आया होगा, पृथ्वी पर कुछ भी नहीं बचा होगा।

अब तक के ज्ञात तथ्यों के आधार पर पृथ्वी पर जो सबसे बड़ी आपदा आई वो डायनासोर के विलुप्त होने के काल की है। डायनासोर जिन्होंने पृथ्वी पर २० करोड़ वर्ष पूर्व से लेकर लगभग ६ करोड़ वर्ष तक अपना वर्चस्व कायम रखा था और वे पृथ्वी के सबसे खूंखार और जघन्य प्राणी थे, उनके विलुप्त होने का कारण पृथ्वी से किसी उल्का पिंड की सीधी टक्कर को माना जाता है।

उस समय पृथ्वी के लगभग 95 प्रतिशत जीव ख़त्म हो गए थे। उस समय पृथ्वी पर उतना पानी नहीं था जितना अब है। आज पृथ्वी लगभग 70 प्रतिशत जल से घिरी हुई है, अतः यदि अब पृथ्वी पर कोई उस तरह की घटना हुई तो ज्वालामुखी और भूकम्प से भी कई गुना अधिक जल से तबाही मचेगी।

यह तो सर्वविदित है कि पूर्णिमा और अमावस्या में ही उच्च ज्वार आते हैं, अर्थात सबसे ऊँची लहरें उठती हैं। एक नहीं सैकड़ों ऐसे उदहारण हैं कि ग्रहण से पूर्व या ग्रहण के बाद अवश्य ही कोई ना कोई घटना घटित होती है। ग्रहण जितना प्रभावी होता है और सूर्य-चन्द्रमा पर राहु-केतु के अलावा जितने अधिक पाप ग्रहों का प्रभाव होता है, परिणाम भी उतना ही भयावह होता है।

इतिहास की कुछ बड़ी घटनाओं और उस समय की ग्रहों की स्थिति का वर्णन मैं यहाँ करना चाहूँगा:

ग्रहों की दृष्टि और घटनाओं की समानता को देखा जाये तो बहुत ही विभत्स और भयानक मंजर महाभारत काल में हुआ था। भयानक रक्त पात हुआ था उस समय भी, धरती काँप उठी थी, इतिहासकारों के अनुसार अक्टूबर माह, 3104 ईसा पूर्व में यह युद्ध हुआ था। उस माह 3 ग्रहण पड़े थे, 6 ग्रह - सूर्य, चन्द्रमा, बुध, गुरु, राहु, शनि - या तो साथ थे, या बहुत करीब थे। सूर्य, राहु से ग्रसित था, उसपर केतु और मंगल एक दूसरे के साथ अंगारक योग बना रहे थे। साथ ही इन दोनों मारक ग्रहों की सीधी दृष्टि, ग्रहण और शनि दृष्टि युत, सूर्य पर थी। परिणाम स्वरूप भीषण युद्ध हुआ, प्राकृतिक आपदाओं का भी ज़िक्र है कहीं-कहीं। यह सब कुछ किसी एक दिन के ग्रहों का परिणाम नहीं था, बल्कि कई वर्षों से ये भूमिकाएँ बन रही थीं।

लगभग ऐसा ही कुछ समय १९४२ से १९४८ का था, जब भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व, द्वितीय विश्व युद्ध के चपेट में था। १९४७ के वर्ष में भी नवम्बर माह में 12 और 28 तारिक को सूर्य और चन्द्र ग्रहण पड़े। उस समय सूर्य, राहु, बुध, मंगल, चन्द्रमा, और शनि जून माह में एक दूसरे के बहुत ही करीब थे, जो कुछ समय पहले और कुछ समय बाद तक भी एक दूसरे के आस पास बने रहे।


यहाँ यह बताना उचित समझूँगा कि इसी वर्ष के अक्टूबर माह में इतिहास की जानकारी के अनुसार अभी तक का सबसे भयानक समुद्री तूफान भी आया था। जिसकी रफ़्तार करीब 250 किमी प्रति घंटे थी। वर्ष १९४५ और १९४७ में पूरी दुनिया में सबसे अधिक और भयानक तूफान आये। ज्ञात तथ्यों के आधार पर १९४२ से लेकर १९४७ के बीच द्वितीय विश्व युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं के कारण पूरी दुनिया में करीब 10 करोड़ से ज्यादा लोग मारे गए थे।

ऐसा ही भयानक मंजर १९७१ में पुनः आया, जब बांग्लादेश का बँटवारा हुआ। एक अनुमान के मुताबिक करीब ३ से ५ लाख लोग मारे गए थे और कई लाख लोग विस्थापित हो गए थे।

बांग्लादेश का युद्ध मार्च १९७१ से प्रारम्भ हुआ था। जिससे ठीक ४ महीने पहले अर्थात नवंबर,१९७० में पूर्वी पाकिस्तान में अब तक के वर्तमान इतिहास का सबसे भयानक "भोला" नामक समुद्री तूफान भी आया था। जिसमें एक अंदाज़ के मुताबिक करीब ५ लाख लोग मारे गए थे। पूरी फसल, पशु-पक्षी, सबकुछ तबाह हो गया था। साथ ही यह भी बता दूँ कि १९७१ में भी भयानक तूफान, सुनामी, और ८.१ तीव्रता तक का भूकंम आया था। अब ग्रहों की स्थिति भी देख लें। 

एक बार पुनः सूर्य-केतु-चन्द्रमा-बुध-शुक्र एक दूसरे के पास, सूर्य-चन्द्रमा-केतु एक साथ ग्रहण योग में, राहु और मंगल एक साथ, सूर्य और चन्द्रमा के ऊपर राहु, मंगल और शनि की पूर्ण दृष्टि।

तारीख
घटना
मारे गए लोगो की संख्या
ग्रहों की स्थिति
26 दिसम्बर 2004
सुमात्रा , इंडोनेशिया में आयी इतिहास की सबसे बड़ी सुनामी , भूकम्प की तीव्रता 9.1  
लगभग २ लाख ३० हज़ारकेतु, सूर्य, मंगल, बुध, गुरु और शुक्र एक दूसरे के बेहद करीब, शनि - चन्द्रमा एक दूसरे पास।

चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में, सूर्य केतु के नक्षतर् में, मंगल शनि के नक्षत्र में,राहु केतु के नक्षत्र में और केतु मंगल के नक्षत्र में। अर्थात भयानक तबाही
27 अगस्त 1883इंडोनेशिया , भयानक ज्वालामुखी विस्फोट , सुनामी और भूकम्प40 हजार से ज्यादा
केतु, शनि, मंगल, चन्द्रमा, गुरु एक दूसरे के बेहद करीब। सूर्य, राहु, बुध और शुक्र एक दूसरे के बेहद करीब।
सूर्य, केतु के नक्षत्र में, चन्द्रमा और मंगल राहु के नक्षतर् में, शुक्र भी केतु के नक्षत्र में और शनि चन्द्रमा के नक्षत्र में, साथ ही राहु केतु के नक्षत्र में और केतु राहु के नक्षत्र में।
9 अगस्त 1138सीरिया - भयानक भूकंपकरीब २ लाख ३० हजारमंगल, केतु और चन्द्रमा एक साथ। मंगल और केतु दृष्टि सूर्य और गुरु पर।

सूर्य केतु के नक्षतर् में और चन्द्रमा राहु के नक्षत्र में साथ ही शनि राहु के नक्षतर् में और केतु सूर्य के नक्षत्र में, अर्थात सूर्य केतु में और केतु सूर्य में।
23 जनवरी 1556चीन, इतिहास का सबसे बड़ा भूकंप8 लाख 30 हज़ार


सूर्य, चन्द्रमा, मंगल शनि की राशि में, चदंरमा और मंगल राहु के नक्षत्र में। मंगल राहु में और राहु मंगल के नक्षत्र में।
मंगल और शनि दोनों की ही दृष्टि राहु पर।
केतु, सूर्य, गुरु, बुध और शुक्र एक दूसरे के बेहद करीब।
मंगल, चन्द्रमा और शनि एक दूसरे के करीब और राहु से दृष्टि सम्बन्ध।
22 मई 1927चीन, भयानक भूकम्प२ लाख से ज्यादाकरीब 10 अंशो के भीतर सूर्य, राहु, मंगल, बुध और शुक्र। चन्द्रमा और केतु एक साथ और शनि के बेहद करीब
6 और 9 अगस्त 1945
जापान, हिरोशिमा-नागासाकी परमाणु बम विस्फोट
३ लाख से ज्यादा तत्काल मौत और लाखों आजतक प्रभावित30 अंशो के भीतर सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, राहु, शनि और शुक्र, अर्थात 6 ग्रह एक दूसरे के बिलकुल पास।

उपरोक्त उदाहरणों से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि जब कभी अधिकतम ग्रह राहु या केतु के समीप हों, सूर्य और चन्द्रमा भी राहु या केतु के प्रभाव में हों, उनसे किसी भी प्रकार का मंगल और शनि का सम्बन्ध स्थापित हो रहा हो तो भयानक विनाश लीला हुई है। इन सभी घटनाओं का जिक्र मैंने तारीख, ग्रहों की स्थिति और होने वाले भयानक परिणामों के साथ इसलिए किया कि पृथ्वी पर होने वाले विनाश और ग्रहों का खेल आपको समझने में मदद मिले।

अब आपको उस तारीख के बारे में बताने जा रहा हूँ, जिस तारीख को ऊपर दिए हुए विनाशकारी तारीखों से भी कई गुना अधिक भयानक दुर्योग है। उस दिन के ग्रहों की स्थिति निचे दी जा रही कुंडली के माध्यम से दिखा रहा हूँ -


ग्रहों की युति देखिये -


  1. उच्च के शनि के साथ नीच का सूर्य, साथ में बुध, गुरु, शुक्र और केतु। अर्थात 6 ग्रह एक साथ (अत्यंत ही दुर्लभ और दुष्कर योग है यह जब 6 ग्रह एक साथ हों )
  2. सूर्य केतु के कारण ग्रहण योग में।
  3. चन्द्रमा, राहु के साथ और ग्रहण योग में।
  4. नीच का मंगल।
  5. नीचस्थ मंगल की चतुर्थ पूर्ण दृष्टि सूर्य, केतु और शनि पर, अर्थात भयानक विनाश।
  6. उचस्थ शनि की दशम पूर्ण दृष्टि मंगल पर।
  7. अर्थात 9 ग्रहों में से 6 ग्रह एक साथ, २ ग्रह एक साथ और नीचस्थ मंगल अकेला।
  8. चन्द्रमा केतु की नक्षत्र में।
  9. बुध, गुरु और शुक्र तीनों ही शुभ ग्रह राहु के नक्षत्र में और तीनों ही अस्त।
  10. शनि मंगल के नक्षत्र में।
  11. राहु, केतु के नक्षत्र में तथा केतु, राहु के नक्षत्र में।
  12. योग व्यतिपात अर्थात अत्यंत ही दुर्योगकारी, तिथि पूर्णिमा।

ऐसा दुर्योग मैंने अब तक इतिहास के किसी भी बुरे से बुरे विध्वंसकारी दिनों में भी नहीं देखा। अब आपको इस महाविनाशकारी तारीख का भी इंतजार होगा। तो चलिए मैं आपको बता दूँ कि ग्रहों का यह महाविनाशकारी योग जिस तारीख को बन रहा है, वह अब से करीब 27 वर्षों बाद आने वाली है।

महाविनाश की वह तारीख है 7 नवंबर 2041

कृष्ण के अवतार के बाद महाविनाश हुआ था, और कृष्ण को ही पूर्णावतार माना गया है। 15 सितम्बर 2014 को महावतार होने की भविष्यवाणी जो मैंने की है, उसका सम्बन्ध ज़रूर इस दिन से होगा।

इस अद्भुत बच्चे के जन्म के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए दिए गए लिंक पर क्लिक करें: इस सितम्बर बन रहा है सहस्राब्दी का सबसे अद्भुत योग - भाग २

क्या - क्या हो सकता है इस तारीख को इसकी भी जानकारी मैं आपको अपने लेख “महाविनाश का दिन - भाग 2 “ में देने का प्रयास करूँगा।

पं दीपक दूबे

आज का पर्व



आज की सेंसेक्स निफ़्टी प्रिडिक्शन्स जानने के लिए यहाँ क्लिक करें: सेंसेक्स निफ़्टी प्रिडिक्शन्स

आज से भाद्रपद का शुक्ल पक्ष प्रारम्भ हो रहा है।

आपका दिन मंगलमय हो!
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